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रितेश बत्रा की “लंच बॉक्स” एक अद्भुत फ़िल्म है| अद्भुत कुछ वजहों से , पहली इसकी अविश्वसनीय कहानी, फ़िल्म के मुख्य सूत्र बॉम्बे के विश्व विख्यात डब्बा प्रणाली की जो कभी गलत नहीं होती |लेकिन ये कहानी है हज़ारों में से एक होने वाली घटना की| दूसरी बात फ़िल्म के परिपक्व निर्देशन को देखकर यह मानना मुश्किल है कि यह निर्देशक की पहली फ़िल्म है| तीसरी बात इस दौर के सर्वश्रेस्ठ अभिनेताओंइरफ़ान खान और नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी को एक साथ देखना कमाल का अनुभव है | चौथी बात इस फ़िल्म की खोजअभिनेत्री निमृत कौर , उनका अभिनय दिल को छूता है और इस किरदार में आप और किसी समकक्ष अभिनेत्री को नहीं सोच पाते, यह अपने आप में बड़ी उपलब्द्धि है | निमृत कौर में हम कहीं रत्न पाठक शाह की हल्की झलक पाते हैं |

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लंच बॉक्स कहानी है दो अधूरे इंसानो की जो यह अधूरापन बांटते हुए एक दूसरे में अपना पूरक पाते हैं| इला(निमृत कौर) एक गृहणी है , एक बच्ची की माँ जिसकी दिनचर्या तय है | सुबह बेटी को स्कूल के लिए तैयार करना और फिर पति के लिए स्पेशल लंच बॉक्स तैयार करना , यह लंच बॉक्स इला की रोज़ की कोशिश है अपने पति का दिल जीतने की|इसी कोशिश में वो रोज़ डब्बा भेजती और फिर शाम को डब्बेवाले का इंतज़ार करती | इस बीच इला की दिनचर्या क्या है यह हमें देखने को नहीं मिलती | यह इला के जीवन के सूनेपन को दर्शाने का निर्देशक का तरीका है , मानो इसके अलावा इला के जीवन का कोई मक़सद ही नहीं| इला की एक ही साथी है , उसके फ्लैट से एक फ्लोर ऊपर रहने वाली आंटी, जिनसे इला की बात एक डलिये के आदान प्रदान से होती है | इस किरदार को हम बस सुन पाते हैं (भारती अचरेकर की बेहतरीन अदाकारी में) | आंटी के पति एक जटिल बीमारी से ग्रस्त हैं, जिनकी जान उनके रूम के ‘सीलिंग फेन’ पर अटकी हुई है , जिसे देखते हुए वो लम्बे समय से बिस्तर में जीवन बिता रहे| मानो एक का पति ना होते हुए भी उसके साथ है और दूसरी का पति होते हुए भी उसके साथ नहीं| इस मिडिल क्लास गृहणी कि भूमिका निमृत कौर ने अत्यंत सरलता से निभाई है , सोच में सिकुड़ी उनकी भौंह , उलझन में आधा खुला मुंह , बेतरतीब से बने बाल और सपाट आवाज़, हर अंदाज़ उस किरदार को जीवंत बनाता है|

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साजन फर्नांडिस(इरफ़ान खान) एक विधुर हैं जिसका एकाकी जीवन उसके नीरस सरकारी दफ्तर की पंक्तिबध्द मेज – कुर्सियों की तरह है , जिसमें सालों से कोई बदलाव नहीं आया है| वो अकेला दफ्तर आता है , अकेले लंच करता है , अकेले काम करता है और हर रात वही ट्रैक पैंट्स पहने अपने पड़ोस के परिवार को एक साथ रात्रि भोजन करते निहारता है | इला का खालीपन उसके प्रति सहानभूति जगाता है मगर साजन का अकेलापन दर्शकों के दिल में दर्द पैदा करता है| इस अकेलेपन ने उसे इतना अव्यहारिक बना दिया है कि रिटायरमेंट के बाद उसके पोस्ट पे आने वाले शेख (नवाज़ुद्दीन सिद्दीकुई ) के आत्मीय व्यवहार और निमंत्रण पर भी असहज हो जाता है |
इस किरदार के ज्यादा संवाद नहीं है | इरफ़ान खान ने सिर्फ आँखों से अभिव्यत किया है|हाथ में व्हिस्की लिए और आँखों में घोर सूनापन लिए ,पड़ोसी परिवार को एक-टक निहारते हुए इरफ़ान का अभिनय, सिहरन पैदा करता है | प्रौढ़ व्यक्ति के किरदार में इरफ़ान खान का यह सर्वश्रेष्ठ अभिनय है|

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इला और साजन की कहानी मिल जाती है गलती से बदले गए लंच बॉक्स से | फ़िल्म में यह गलती अव्यवहारिक है क्यूंकि मुम्बई की डब्बा प्रणाली अपनी गुणवत्ता के लिए विश्वविख्यात है| |लेकिन ये प्रेम कहानी सबसे अलग है , जो उम्मीद जगाती है , प्रेम को नयी परिभाषा देती है |दोनों कभी एक दुसरे को देखे नहीं हैं | उनके जीवन में प्रेम अनायास आता है | यह अनदेखा , स्वार्थहीन प्रेम उन्हें बदल देता है| इला को साहस देता है कि वो प्रेमविहीन विवाह से आज़ाद हो और साजन की वर्षो की उदासी तोड़ता है|

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फ़िल्म का तीसरा कोण शेख है | शेख का पात्र बहुत ही सच्चा और प्यारा है| यह पात्र झूठ बोलता है , चाटुकारिता करता है , हाथ धोकर पीछे पड़ जाता है और ऑफिस फाइल्स में सब्जी काटता है मगर इला -साजन के फीके दाल-चावल में चुटकी भर नमक की तरह है| उसने अपने जीवन में बहुत उतार चढ़ाव देखे हैं मगर प्रेम ने उसे थामे रखा| शेख, ज़िद कर के साजन के जीवन में हस्तक्षेप करता और धीरे से उसे अपना बना लेता है | वो साजन के प्रेम का अकेला साक्षी है| नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी ने पात्र को ऐसे निभाया है कि दर्शकों को भी उन पर प्यार आएगा| नवाज़ जब स्क्रीन पर होते हैं , तब आप एक पल के लिए भी पलकें नहीं झपक सकते , न जाने एक पल में आप कौन सा सिनेमाई जादू खो दें| फ़िल्म के एक दृश्य में शेख , अपने सीनियर साजन को दावत पे बुलाता है , उस दृश्य की ताकत दो बेजोड़ कलाकारों को एक फ्रेम में कैद करने में है , खुद में एक अनुभव है |

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फ़िल्म का मुख्य पात्र मुम्बई शहर है जहाँ लोग हज़ारों की भीड़ में भाग रहे हैं , मगर कोई कहीं पहुँच नहीं रहा , सारे ही नितांत अकेले हैं| वर्षों से ट्रैन और बस में खड़े खड़े सफ़र करते नायक को डर है कि शायद कब्र में उसे खड़े होने लायक ही जगह मिले |इस फ़िल्म का निर्माण 5 से ज्यादा स्टूडियोज ने एक साथ किया है , जिसमें करण जोहर से लेकर अनुराग कश्यप तक की विविधता है | इतने सारे बड़े नामो के बावजूद एक ईमानदार और सार्थक सिनेमा का बनना सुखद आश्चर्य है।

लंच बॉक्स इस साल की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म है | रितेश बत्रा जो शॉर्ट फिल्म्स बनाते थे , मुम्बई के डब्बावालों पे डाक्यूमेंट्री बनाने चले थे |डब्बावालों के साथ वक़्त गुज़ारते हुए उन्हें उनसे जुड़ी अलग अलग कहानियां सुनने को मिली| उन्हीं में से एक कहानी बनी लंच बॉक्स | ज़िन्दगी हमें हमेशा अपने कहानियों से अचंभित करती है , कुछ कहानियां स्क्रीन पर चमकती हैं , कुछ अनसुनी रह जाती हैं|

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