
हिंदी सिनेमा में छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व बहुत कम हुआ है। हुआ भी तो वहाँ की चिर-परिचित समस्या-नक्सलवाद को लेकर। नेटफ्लिक्स की नई पेशकश, निर्देशक अपूर्व बड़गैय्यां की ‘चमन-बहार’, छत्तीसगढ़ के छोटे कस्बे ‘लोरमी’ की कहानी है, वहाँ के पुरुषों की, उनकी लम्पटता की, उनके प्रेम की, बेरोजगारी की और उनकी राजनीति की।

अपूर्व धर ने छोटे कस्बे को पर्दे पर इतनी खूबसूरती और सच्चाई के साथ उकेरा है कि सब कुछ बहुत धीमा, बहुत सरल और बिना किसी बनावट के होते हुए भी बेहद ‘सिनेमैटिक’ लगता है।लोरमी, जहां का जीवन अभी भी शहर की छटपटाहट और हड़बड़ाहट से अछूता है, जहां के युवाओं के पास मोबाइल में सर गाड़ने के बजाय लड़की को निहारने की फुर्सत है, पान- ठेलों और कैरम में शामें बिताने के लिए समय की कोई कमी नहीं है और जहां का हर पहर रेडियो के साथ गुजरता है, अपनी सादी आभा लिए हुए बहुत सुंदर लगता है। फिल्म के opening credits में कस्बे की सुबह-शाम, ग्रामीण जीवन को बहुत लुभावने तरीके से फिल्माया गया है।


पिछले महीने ही हमने हिंदी सिनेमा का एक ऐसा नायक देखा था जो आटा चक्की चलाता था(गुलाबो सिताबो ), इस हफ्ते आयी ‘चमन बहार’ का नायक ‘बिल्लू’, पान की दुकान चलाता है। बिल्लू महत्वाकांक्षी है, उसे अपने पिता कि तरह वन विभाग के नौकरी करते हुए जंगलों में नहीं रहना है। हर आम युवा की तरह बिल्लू के भी अपने पिता से वैचारिक मतभेद है। गांव के बड़े व्यक्ति से उधार लेकर बिल्लू शहर की ओर जाने वाली मुख्य सड़क में अपनी पान दुकान खोल लेता है। मगर लोरमी के दूसरे जिले में जाने की वजह से उस मार्ग में यातायात कम हो जाता है।
जिला बदलते ही बिल्लू की किस्मत और कस्बे की रंगत बदल जाती है, जब पान ठेले के सामने सरकारी आवास में एक परिवार रहने आता है जिनकी किशोरवय बेटी पूरे कस्बे के युवाओं के लिए आकर्षण का केंद्र बन जाती है।

गौरतलब है कि हमारी संस्कृति में पान ठेले हमेशा से ही पुरुषों के गप्पबाजी और बैठकी जमाने के अड्डे रहें है और पान वाले उन तमाम अड्डों के, उनमें होने वाले लफड़ों के, वहां बनने वाले बतंगड़, के गवाह होते है।
ना चाहते हुए भी, बिल्लू का पान ठेला, रिंकू को रिझाने के लिए जंग का मैदान बन जाता है और उसके सारे ग्राहक, योद्धा बन जाते हैं। बिल्लू भी रिंकू पर मोहित हो जाता है मगर उसे अपना प्रेम सबसे छुपाए रखना पड़ता है।

चमन बहार बिल्लू की कहानी है। बिल्लू अपने नए-नए व्यवसाय के दाव पेंच सीखने के साथ-साथ, प्रेम के कठिन पाठ भी सीखता है।
उसकी कहानी और ख़ास बन जाती है उसके आस- पास के किरदारों से और इस कहानी के catalyst होते हैं छोटू और सोमू , दो बेरोज़गार, छत्तीसगढ़ी में कहेंगे ‘ठलहे’, नारद मुनि जिनके जीवन का उद्देश्य और सुख केवल लगाई-बुझाई में है। बिल्लू के जीवन में उत्साह, व्यवसाय, ग्राहक, प्रेम, हास्य, मनोरंजन और सारी मुसीबतें छोटू डैडी(कहानी में दोस्त-भाई को संबोधित करने का तरीका) और सोनू डैडी ही लेकर आते हैं। इनका किरदार बहुत कुछ विशाल भारद्वाज की ‘मकबूल’ के इंस्पेक्टर पंडित और पुरोहित से प्रेरित लगता है

कहानी की पृष्ठभूमि हिंदी साहित्य के गांव-कस्बों की कहानियां जैसे श्रीलाल शुक्ल की ‘राग दरबारी’ और अमृतलाल नागर की ‘बूंद और समुद्र’ जो कि अपने किरदारों के लिए अमर है, उनसे प्रेरित लगती है। लेखक दर्शकों को सीधा हमारे देश के छोटे कस्बों के अड्डों में ले जाते हैं जहां अतरंगी किरदारों का जमावड़ा होता था। गांव का राजकुमार, रईसजादा जो बड़े अफसरों की बेटी को रिझाने में ख्याति प्राप्त है, अक्ल से पैदल राजनैतिक परिवार का शहजादा, चार चेलों के बिना जिसकी गाड़ी आगे नहीं बढ़ती और डीएफओ का अकड़ू, अंतर्मुखी बेटा जो पूरे कस्बे की समझ से परे है। इन सौ बिमारों की एक अनार है रिंकू निनोरीया।



रिंकू अच्छे परिवार की किशोरवय छात्रा है जो लोरमी जैसे छोटी गांव में किसी अप्सरा की तरह आती है। स्कूल से आती जाती अपने बाइक के पीछे लफंगों की टोलियां घुमाती और शॉट पैंट में घर के पास अपने पालतू डॉगी को टहलाती रिंकू , लोरमी की हवा से अनजान किसी 16 साल की बच्चे की तरह रह रही होती है। मगर छोटे कस्बे सुंदर, आधुनिक,आकर्षक युवतियों के लिए मुश्किल जगह बन जाते हैं।क्योंकि छोटे शहरों की लड़कियों को अक्सर सिखाया जाता है कि कोई आवारा अगर तुम्हारा पीछा करें तो बिना प्रतिक्रिया दिए नाक की सीध में घर आ जाना और पलट कर जवाब नहीं देना।
रिंकू सबसे ऊपर और सबकी पहुंच से दूर है। दरअसल, यह कहानी पुरुषों की नजरिए से है (male gaze)। निर्देशक का कैमरा लैंस कभी भी रिंकू के करीब नहीं जाता। बिल्लू और
सारे लड़कों की तरह दर्शक भी रिंकू को केवल दूर से ही निहारते हैं।
कहानी में उत्पन्न हास्य और रिंकू के लिए लोगों की दीवानगी बहुत बार हमें बहुत बार असहज करती है। और क्यों की कहानी पुरुष नजरिए से कहीं गई है इसलिए हम कभी रिंकू की कोई बात नहीं सुनते हैं ।हमें बस रिंकू की गरिमा दिखाई देती है

रिंकू को पाने की रेस में बिल्लू बहुत पीछे हैं। उसे पता है कि उसका व्यक्तित्व और अस्तित्व रिंकू को आकर्षित करने के लिए कुछ भी नहीं है इसलिए उसके पालतू डॉगी ‘रूबी’ को सड़क के आवारा कुत्ते से बचाकर , बिल्लू, सपने में रिंकू के करीब जाने की हैसियत कमा लेते हैं। रिंकू सब देख कर और समझ कर भी चुप रहती है। रिंकू की चुप्पी हमें बहुत बेचैन करती है। ऐसे ही देखते देखते मासूम रिंकू की हाफ पेंट फुल में बदल जाती है और उसके चेहरे के भाव और तटस्थ।

2018 मैं बन गई यह फिल्म अगर पिछले वर्ष ही आ गई होती तो कबीर सिंह की तरह सिनेमा की राजनीति की आग में सिक गई होती। मगर, चमन बहार कोई प्रेम कहानी नहीं है और ना ही एक अनार और सौ बीमार के तर्ज पर कोई हल्का हास्य। ये छोटे गांवों-कस्बों की संस्कृति पे एक टिप्पणी भी है और वहां बीते वक्त का लेखा-जोखा भी। इसमें वहां के बेरोजगार , निकम्मे युवाओं के अड्डेबाजी की भी बात है, आवारागर्दी की भी, छुट भैय्या नेताओं की टुच्ची राजनीति की भी, पुलिस के रोमियो धर- पकड़ योजना की और गांव कस्बों में आदर्श की अनुपस्थिति की भी। फिल्म के एक दृश्य में शिलादित्य, स्थानीय नेता ,रिंकू की क्लास में धाक जमाने, खेलकूद में जीते हुए छात्रों को पुरस्कृत करने आता है। जैसे ही बारी-बारी से वो एक-एक का नाम लेता है इससे पता चलता है कि कैसे फलां-फलां छात्र जो दौड़, भाला फेंक के विजेता थे, वे अब सब्जी तरकारी बेच रहे हैं।

और जब दर्शक, छात्रों से लेकर मास्टर तक को रिंकू का पीछा करते देख बहुत असहज हो चुके होते हैं तभी लेखक-निर्देशक बिल्लू को उसकी गलती का एहसास करा, उस्से पश्चाताप करा देते हैं। पुलिस के हाथों बुरी तरह पिटा बिल्लू, “सोनम गुप्ता बेवफा है” की तर्ज पर रिंकू को सारे कस्बे में बदनाम करता है। हमारे देश के निकम्मे,दिलजले,एक-तरफा आशिक इसी तरह भ्रमित होते हैं। सबके बीच तमाशा और राजनैतिक टट्टू बन जाने के बाद, बिल्लू को बचाने रिंकू का संभ्रांत परिवार ही आगे आता है।

अपराध बोध से लदा मन लेकर बिल्लू उनके घर पहुंचता है। निशब्द बिल्लू उनके कमरे की दीवारों को निहारता है। वहां लगी पारिवारिक तस्वीरों में अपना खोया हुआ बचपन ढूंढता है। तस्वीरों में एक छोटा सा सुखी परिवार देखकर शायद बिल्लू सोचता है कि उसके भी ऐसे अपने होते तो वो इन रास्तों में नहीं जाता।महीनों से रिंकू को दूर से निहारता, उसके सपने बुनते बिल्लू के सामने जब रिंकू आ जाती है , तो वो उसे आंख उठा के देखने की बजाय, आत्मग्लानि से अपना सर झुका देता है।
दर्शक भी रिंकू की सिर्फ ‘फुल’ पैंट देख पाते हैं।
प्रेम और पछतावे में हारे हुए बिल्लु को उसी सड़क के आवारा कुत्ते का सहारा मिलते है जिसे कभी उसने मार भगाया था। दोनों प्रेम में अयोग्य साबित हुए, एक दोराहे में खड़े हैं।

फिल्म के लगभग सभी मुख्य कलाकार छत्तीसगढ़ से नहीं हैं मगर स्थानीय भाषा, बोली और हाव-भाव में उनकी पकड़ बहुत हद तक विश्वसनीय लगती है। बिल्लू के किरदार में जितेंद्र कुमार के अभिनय में ज़रूरी मासूमियत और बेचारगी है जो बिल्कुल साधारण किरदार को भी चहेता बना देती है। जेब में हाथ डाले, कंधे को झुकाए जीतेन्द्र पूरे के पूरे , लोरमी के ही लगते हैं और उन्होंने छत्तीसगढ़ी लहज़ा भी बखूबी निभाया है।


आलम खान (शीला भैय्या) और अश्विनी कुमार (आशू भैय्या) भी अपने किरदार में जँचते हैं। धीरेन्द्र तिवारी (छोटू डैडी) की कॉमिक टाइमिंग और अभिनय में गजब का ठहराव है। भुवन अरोड़ा(सोमू डैडी) भी काबिल अभिनेता हैं और धीरेन्द्र के साथ मिलकर कहानी में कमाल का हास्य और रस भरकर उसे वक्त-वक्त पर आगे बढ़ाते हैं मगर भुवन का व्यक्तित्व किसी बड़े शहर का ही लगता है। रितिका बिदियानी (रिंकू ननोरिया) को जितना कैनवास मिला उसमें वो बिना किसी संवाद के भी आकर्षक लगती हैं।
‘चमन बहार’, निर्देशक अपूर्व धर का अपने शहर, अपने कस्बे, वहां बीते अपने बचपन, युवावस्था के नाम प्रेम पत्र है।आँचलिक भाषा, संगीत और संस्कृति का अच्छा तालमेल जो नेटफ्लिक्स के जरिए पूरी दुनिया में पहुंचेगा और छोटे शहरों, कस्बों का हर व्यक्ति उससे खुद को जोड़ पाएगा।






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