
स्वागत है आप सबका कपूर परिवार में| नाम से और खासकर ‘धर्मा प्रोडक्शंस’ के नाम से आपका अनुमान होता है की यह एक “परफेक्ट” परिवार की कहानी है| जिसमें परिवार के बुजुर्ग 90 वर्षीय दादाजी हैं जो अपने ज्ञान, तजुर्बे और ओहदे से परिवार का मार्गदर्शन करते हैं, आदर्श और सफल माता पिता है, बच्चे भी काबिल और आज्ञाकारी और बड़े प्रोडक्शन हाउस के बड़ी फिल्मों की तरह सब पारिवारिक कार्यक्रम में मिलते है, आलिशान सेट्स में 100 डांसर्स के साथ नाच गाना होता, लड़की बीच में आके प्रेम त्रिकोण बनती है, परिवार में मन-मुटाव होता है और ज़रा से उतार चढ़ाव के बाद सब ठीक हो जाता है , अंत में वही 150 डांसर्स के नाच गाने के साथ|
खैर आधी ग़लतफहमी हमारी, फिल्म का ट्रेलर दूर कर देता और बची-खुची गलतफहमियाँ, शकुन बत्रा का निर्देशन धराशायी कर देता है|
बहरहाल कहानी है भी इतनी साधारण सी ही, किन्तु फिल्म का ट्रीटमेंट 1990’s के बाद के 2 दशकों से सफर करते हुए होते हुए बहुत आगे निकल आया है और आज के दौर का बेहद परिपक्व(mature) और ताज़ा ट्रीटमेंट है|
फिल्म ज़रा प्रेडिक्टेबल होने के बाद भी अच्छे अभिनय और सधे हुए निर्देशन से एक सुखद आश्चर्य की तरह लगती है|
कपूर एंड संस कहानी है, एक ‘डिसफंक्शनल ‘ परिवार की , जिनकी एक दुसरे से बहुत उम्मीदें हैं और शिकायतें भी , मगर खुद सबकी अलमारी में कंकाल है(skeleton in their closets)| बिलकुल स्वाभाविक सा परिवार है , जैसा हम सब का होता है, सबके ग्रे शेड्स हैं| दादाजी है , जिनका एक पैर कब्र में है , मगर हिंदी सिनेमा के सबसे कूल, नामाकूल , निर्लज्ज बुजुर्ग हैं, पोतों के ऑय-पापड़ (ऑय-पैड) में पॉर्न देखते हैं, झरने के नीचे नहाती , मंदाकिनी को फैन्टसाइज़ करते हैं और पोतों के साथ कश लगाते हैं| इन्ही दादाजी की तबियत खराब होने पर दोनों पोते विदेश से घर आते हैं, दो भाईयों का भी अपना इतिहास है, कहीं एक रंज है , एक “परफेक्ट” बेटा है तो दूसरा “लूज़र”| माँ बाप के रिश्ते में अपनी कड़वाहट है, अविश्वास है|दादाजी की एक इच्छा है कि मरने से पहले एक “हैप्पी फैमिली” तस्वीर खींची जाए और इस इच्छा के पूरे होने तक का और सारे परिवार के इकट्ठे आने तक का संघर्ष ही कहानी को आगे बढ़ाता है|
शकुन बत्रा काबिल निर्देशकों में अपना नाम उनकी फिल्म ” एक मैं और एक तू से ” जो कि काफी ‘अंडर-रेटेड’ फिल्म रही है, में दर्ज कर चुके थे और इस फिल्म से वह अपनी काबिलियत साबित कर देते हैं| फिल्म की पटकथा कहीं सुस्त नहीं पड़ती और चरित्रचित्रण काफी परीचित होते हुए भी , ताज़गीभरा है |
मगर सबसे अधिक प्रभाव कुछ लाता है तो वह फिल्म के संवाद और संपादन | जो भाषा किरदार बोलते है , आप खुद को उससे जोड़ पाते है| जितने बार फिल्म के किरदार एक दुसरे से बात करने आते हैं, वह दृश्य , संवादों से बेहद स्वाभाविक और प्रभावशाली बन जाता है, आपको गुदगुदाता है, टीस भी पैदा करता है|दृश्यों का ‘सीमलेस’ बहाव कमाल का है, और दृश्य के बीच में हर किरदार पर कैमरे का घूमना बहुत यथार्थ देता है|यहाँ कोई पिता लम्बी आह लेकर , साँसे भींच कर , संवाद नहीं फेकता न ही कोई बेटा कंकापते स्वर में , बिलखते हुए बोलता है| किरदार बस बोलते जाते है, जैसे हम बात करते है| इससे पहले यह सीमलेस दृश्यों का बहाव फिल्म “पीकू” में हुआ था| लोकेशनस भी खूबसूरत है,कुन्नूर के आसमान में घिरे बदल और कपूर फैमिली के आशियाने के भीतर छाए हुए शिकायतों ,बेरुखी के बादल, एक सा प्रभाव डालते हैं|
फिल्म किसी एक किरदार से सम्बंधित नहीं है और हर कलाकार को उभरने का बराबर मौका मिलता है| ऋषि कपूर के आगे हम नतमस्तक है, मेकअप ज़रा कम होना था, वही आपको हँसाते भी हैं , वही रुलाते भी| रतना पाठक शाह और रजत कपूर सबसे सशक्त हिस्से हैं फिल्म के , शादी को हुए इतने सालों बाद के रिश्ते और उनके बीच के मत मुटाव आपको अपने आस पास के बहुत से दंपत्ति की याद दिला देंगे|
फवाद खान गजब के खूबसूरत है, और अपने किरदार में बहुत संतुलन साथ ही साथ तीव्रता लिए हुए हैं, भावुक दृश्यों में उनकी आँखों की तीव्रता और मजबूरी , दर्शकों को ज़रा हिला देती है| सिद्धार्थ मल्होत्रा अंडरप्ले करते हैं, ठीक ही करते है| आलिया भट्ट, हाईवे के बाद दोबारा चमकती है, फिल्म में ज़रूरी ताज़गी और charm लाती है| इसके अलावा सहायक पात्र भी कमाल के हैं, और उन सब से मिलके ही फिल्म उभरती है|”कपूर एंड संस” करण जोहर के जुमले “It’s all about loving your family ” का ही विस्तारित हिस्सा है लेकिन फिल्म देखकर अनुभव होता है की हम सिनेमा में पिछले 2 दशकों में कितने आगे आये हैं| फिल्म बहुत से stereotypes को तोड़ती है, फिल्म में समलैंगिगता(homosexuality) को पहली बार तो नहीं, मगर हिंदी सिनेमा में शायद पहली बार ही इतनी गरिमा और ईमानदारी से दर्शाया गया है, फिल्म आदर्श परिवार के मिथ्यों को भी तोड़ती है और “विक्की डोनर” की मॉडर्न दादी के बाद यह दादाजी , modernism को 10 पायदान ऊपर ले जाते हैं|फिल्म खत्म होने पर आपको आपका “imperfect” परिवार बहुत याद आएगा , जिनके दादा दादी, माँ-पिता साथ हैं , वह उनसे गले लगके यह बताना न भूलें की आपके जीवन में उनकी क्या अहमियत है”|इसे अपने “इम्पर्फेक्ट” परिवार के साथ ही देखें और ज़रूर देखें |After all these years, “It’s still about loving your family”.Suhani





Leave a comment