
तमाम विवादों के बाद उड़ता पंजाब रिलीज़ हुई | यह अभिव्यक्ति की आज़ादी की एक ऐसी लड़ाई थी जिसे खुले दिल से सारे सिनेमाप्रेमियों ने अपनी अपनी हैसियत से लड़ी , निर्माताओं ने कोर्ट में और दर्शकों ने सोशल नेटवर्किंग माध्यम में| इस विवाद ने फिल्म के प्रति जिज्ञासा भी बढ़ाई और उम्मीदें भी| उड़ता पंजाब बेहद ख़ास महत्व की फिल्म भी है| पिछले दशक से वो पंजाब जिसके हर घर ने भारत को किसान और जवान दिया है , आज वहां यह स्तिथि है की गाँव के गाँव चिट्टे नशे की गर्द में डूबे हैं|और फिर सिनेमा केवल मनोरंजन तो नहीं, समाज का आइना भी है| अभिषेक चौबे की “उड़ता पंजाब” उसी आईने को चार भागों में तोड़ती है, उनमें से कहानियां निकलती हैं मगर हर तस्वीर तड़की हुई, एक दुसरे की पूरक नहीं| इस उड़ते पंजाब में हर कोई ड्रग्स से अपनी अपनी जंग लड़ रहा है| एक सनकी, झक्की , संयोगवश रॉकस्टार जिसका संगीत करियर ढलान पे हैं, एक भ्रष्ट पुलिस अफसर जिसे ड्रग एब्यूज की संजीदगी का एहसास तब होता है जब उसका छोटा भाई इस पाताल में धस चुका होता है, एक बिहार की दिहाड़ी मजदूर जो बेहतर जीवन के आस में substance abuse और यौन शोषण के पिंजरे में बुरी तरह फंस जाती है और एक डॉक्टर जो अपने संसाधनों और हैसियत के मुताबिक एकतरफा लड़ाई लड़ रही है |
उड़ता पंजाब प्रभावशाली है मगर निपुण नहीं |जितनी अच्छी नीयत लेकर अभिषेक( निर्देशक), सुदीप शर्मा (लेखक) और अनुराग (निर्माता) चलते हैं, उड़ता पंजाब मील का पत्थर साबित हो सकती थी मगर फिल्म मेकिंग शैली में बहुत जगह कमज़ोर पड़ जाती है|
फिल्म शुरू बड़े मज़ेदार ढंग से होती है, जिस किफ़ायत से निर्देशक चारों किरदारों का परिचय देते हैं , उससे ही समझ आता है की यह फिल्म केवल पंजाब के बारे में है किसी अभिनेता के बारे में नहीं , चारों कहानियों एक दूर से भिन्न आकार लेती हैं मगर एक दुसरे से मिलने के लिए कई बार भटकती हैं और अंत तक लगने लगता है की किसी तरह ही समापन ढूंढ पायी हैं| लेखक, निर्देशक के तथ्य खरे हैं, और रिसर्च के लिहाज़ से भी काफी मेहनत की गयी है| इसलिए कहीं न कहीं यह well researched फिल्म बन के रह जाती है, well made नहीं| बहुत आयामों पे उड़ता पंजाब किसी डाक्यूमेंट्री की तरह ईमानदार , साहसी और सच्ची है मगर इसमें डार्क ह्यूमर भी है, त्रासदी भी और रोमांस भी| लेखक बहुत से पहलुओं को छूना चाहते हैं जिससे कई बार लगता है की उड़ता पंजाब की आत्मा तो सधी है मगर ढांचा उड़ गया हो| चारों कहानियों में बहुत सी गुंजाइश लगती है मगर गहराई केवल आलिया भट्ट की कहानी में है |
फिल्म की चुनिंदा स्टारकास्ट उत्तम है |शाहिद कपूर परिपक्व अभिनेता हैं , उन्होंने मौजूदा दौर के रैपर्स के हावभाव ओढ़ लिए हैं मगर वह इस से ज्यादा काबिल हैं, बहुत जगहों पे हनी सिंह के कैरीकेचर ज्यादा लगते हैं, मानो शोर ज्यादा हो और तीव्रता कम| करीना कपूर “गीत” के लिए ज्यादा याद की जाती है मगर गम्भीर किरदारों को निभाने का उनमें हुनर गजब है, अपने किरदार के अंत में उन्होंने जो दर्द अपने चेहरे से बयां किया है वही भाव दर्शकों को झकझोरता है और हाथ पैर मार रही कहानी में जान डालता है| आलिया भट्ट और दिलजीत दोसांझ किसी सुखद आश्चर्य की तरह हैं ,आलिया के किरदार की जीजीवशा पंजाब के युवाओं के लिए प्रेरणात्मक प्रतीक होनी चाहिए |सारी त्रासदियों के बीच वह अकेली आशा की किरण है और अगर उच्चारण की कमी को नज़रअंदाज़ कर दिया जाए तो आलिया ने डूब कर जिया है इस किरदार को|और इन सबमें हिंदी दर्शकों से अपरिचित पंजाबी अभिनेता दिलजीत दोसांझ अपने मासूमियत और सच्चे अभिनय से सबका दिल ज़रूर जीतेंगे| सतीश कौशिक को भी चमकने का पूरा मौका मिला है|





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