
हमारे मोहल्ले में भी दो बहनें रहती थीं। नाम था लल्ली और गोलू |उनको भी बहुत बार ऐसे ही एक दूसरे को बड़ी शिद्दत के साथ गाली देते और बाल नोचते देखा है| और उस वक़्त भी हम सब के लिए ये झगड़ा किसी ’परफॉरमेंस’ की तरह रोचक होता था|बड़की-छुटकी के किरदार में मुझे मेरे मोहल्ले के किरदार दिखे, ये रही बात ‘रियलिज़्म’ की| अमूमन हर भाई बहन, एक दूसरे से कभी न कभी ऐसे लड़ते ही हैं| वक़्त के साथ हाथ पैर चलाना कम हो जाता है , लेकिन मंशा बिलकुल वैसी बनी रहती है| पटाखा की ‘बड़की- चुटकी’ में एेसी कोई औपचारिकता आयी नहीं है| लड़ना और एक दूसरे पे झपटना उनके जीवन का मक़सद ही नही, उनके ज़िंदा रहने के लिए निहायत ही ज़रूरी है|

फिल्म शुरू होते ही वे लड़ती हैं, फिल्म आगे बढ़ते हुए वे लड़ती हैं, और जब नहीं लड़ पाती हैं तो अंदर ही अंदर मर जाती है| और आखिर में जब उन्हें हमेशा रोकने वाला, बापू कहता है कि, “जाओ, लड़ो”, तो एक दूसरे से लिपट करके रोने लग जाती हैं| मगर जब एक बहन दूसरे के कपड़े पहनकर चोरी से भागती है तो जाते हुए सोती हुई बहन को ठीक से चादर ओढ़ाती है, जब गाँव का ठरकी पटेल एक को छेड़ता है तो दूसरी उसके कार के शीशे तोड़ देती है| जितनी तन्मयता से यह दोनों सारी दुनिया को भूल के लड़ती हैं, उतना लगाव तो राजश्री और धर्मा की फिल्मों के भाई-बहन के प्रेम में भी नहीं मिलता|

‘पटाखा’ के साथ भारद्वाज फिर से ग्रामीण पृष्ठभूमि की ओर लौटे हैं मगर इस बार इतने ठेठपन के साथ कि आप अपने शहरों के मल्टीप्लेक्स में देखते हुए भी खुद को मिटटी, गोबर, धूल में सने हुए पाएंगे| किरदारों के कपड़े, उनकी बोली, उनके घर, उनके खेत, उनकी शादियां, उनकी गालियां सब बिलकुल सच्ची, एकदम ठेठ| पता नहीं कितने सालों बाद ग्रामीण मेला ,परदे पर दिखा| शायद 70 के बाद| फिल्म के एक दृश्य में छुटकी का किरदार , संगीत के कार्यक्रम के बाद, ‘कोल्ड ड्रिंक्स’ की बोतलों से बचे हुए पेय, एक बोतल में भरती है और इस काम में उसका हाथ बटाने बड़की आती है, जहाँ एक भावुक क्षण भी होता है| निर्देशक की मित्तव्ययिता और देहाती जीवन में पकड़ देख कर मज़ा आता है।
विशाल भरद्वाज ने ‘पटाखा’ में जो यह दुनिया, यह गाँव, यह किरदार रचे हैं यह खुद में काफी अजूबे हैं और परस्पर विरोधी भी| मसलन बड़की (राधिका मदान) और छुटकी (सान्या मल्होत्रा ) गाँव की लडकियां है, मटमैली सी रंगत है, बीड़ी पी-पी कर दाँत पीले हो गए हैं, लेकिन बस शादी करने के गृहस्थी बसाने का इरादा नहीं रखती|दोनों की महत्वाकांक्षाएं दर्शकों को चौका देती हैं| दोनों ने ही सपना पाल रखा है|एक को अंग्रेजी की शिक्षा लेकर स्कूल चलाना है और दूसरी को अपनी खुद की डेयरी खोलनी है| दोनों को प्रेम भी होता है के गावों के काबिल लड़कों से| जगन(नमित दस) और विष्णु(अभिषेक दुहन) को भी इनसे प्रेम होता है तब यह उनसे भी भिड़ ही रही होती हैं|और अपने पिता के पसंद किये गए लड़को से कोई समझौता नहीं करती, अपनी मनमर्जी से विवाह करती हैं|

भारद्वाज ने हमें अत्यंत पारम्परिक परिवेश में काफी प्रगतिशील मर्दों के किरदार दिए हैं| जगन और विष्णु कभी भी बड़की चुटकी को उनके सपने पूरे करने से रोकते नहीं, उनकी महत्वाकांक्षाओं में अपनी पूँजी लगाते हैं, उनकी इच्छाओं का सामान करते हैं| वहीँ उनके बापू(विजय राज़) जिसने उन दोनों को अकेले पाला है, बीड़ी पीने पर उनको धुनते भी हैं मगर उनके झगड़े के आगे असहाय भी हैं | विदाई के वक़्त उनको माँ जैसी समझाईश भी देते हैं| और फिर हैं सबसे मज़ेदार किरदार, डिपर (सुनील ग्रोवर) जो नारद भी है, सबसे प्यारा दोस्त भी और बड़े भाई जैसे सारी मुश्किलों का तारणहार भी|

पटाखा को ऊपर उठाता है सारे कलाकारों का अभिनय| राधिका मैदान और सान्या मल्होत्रा परदे पर जो लड़ी है, जो हाथ पैर चलायी और जैसे रस ले लेकर एक दुसरे को कोसी हैं, हिंदी सिनेमा में हीरोइन की छवि बदल के रख दी हैं|उनका अल्हड़पन, बागीपन, बीड़ी पीना, रोना-धोना, सर पीटना, निराशा, हाय तौबा उनके किरदारों में गजब का यथार्थ ले कर आता है| दोनों किसी भी वक़्त अपने करैक्टर का सुर नहीं छोड़ती, यहाँ तक की लोक गीत में थिरकते हुए भी| उनके अभिनय क्षमता की सबसे बड़ी झलक आप “एक तेरो बलमा” गीत में देख सकते हैं, अक्खड़ ठाठ और शुद्ध देसीपन से निभाया हुआ नाच| ये यक़ीनन इस साल की कुछ बेहतर अभिनय में से है| नमित दास और विष्णु दुहन को जितना मौका मिला है, उसमें चमकते हैं| सुनील ग्रोवर की जो महारत है उसमें उन्होंने कमाल कर दिया है| मगर विजय राज़ ने अपनी बच्चियों से त्रस्त, असहाय मगर उनको भरपूर लाड करने वाले पिता के रूप में बहुत नियंत्रित अभिनय किया है, न एक सुर ऊपर न एक सुर नीचे|

जितनी मजे़दार, नमकीन, मीठी, मसालेदार फिल्म विशाल भाराद्वाज ने बनाई है उस्से भी ज्यादा मज़े का गीत बनाया है ‘दाएँ पटाखा बाएँ पटाखा’ और गोबर युद्ध के दौरान जब ये गाना बजता है तो बिना ठहाके लगाए ये देखना संभव नही।
विशाल भारद्वाज ने एक इंटरव्यू में बताया कि जब उनके प्रोडूसर ने उनसे बार बार पूछा कि आखिर ये दोनों इतना लड़ती क्यों है? तब उन्होंने झल्ला कर जवाब दिया की आखिर हिन्दुस्तान-पकिस्तान इतना क्यों लड़ते हैं?दो बहनों के बीच इस घोर के झगडे का कोई कारण न मिलने पर उन्होंने यह कहानी भारत पकिस्तान कि कहानी कि तरह विकसित की। कहानी के अंत तक यह ‘मेटाफर’ पूरी तरह से उचित साबित होता है और लात-घूसों, गाली-उलाहनों, गोबर-कीचड़ की पटकथा में ज़रूरी भावुकता ले कर आता है|
एक दूसरे से दूर होने पर, न लड़ पाने पर, जब कुछ देखने-सुनने की समझ ही ख़तम हो जाए , इससे बड़ा प्रेम कुछ हो सकता है भला?





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