
मुराद: मजबूरियों का हीरो
मुराद जैसे हीरो पिछले कुछ सालों में बहुत ही कम आये हैं, वह स्वभाव से बंधा हुआ है ही ,हालातों से भी बंधा है| पिछले साल मुक्काबाज़ में श्रवण (विनीत कुमार सिंह) पिछड़े तबके की राजनीति का शिकार था, न्यूटन में नूतन कुमार(राजकुमार राव) के पिछड़े वर्ग के होने के कुछ संकेत थे और मसान में दीपक (विक्की कौशल) दलित था| मुराद की राजनीति जाती और श्रेणी दोनों ही है | परिवार के अंदर की राजनीति अलग है| वो हर तरह से अंडर-डॉग है |
फिर भी ज़ोया अख्तर का मानना है कि मुराद प्रतीक है उनकी इच्छाओं का, जिस तरह के पुरुष वो इस दुनिया में देखना चाहती है| मुराद संवेदनशील है, उसे फ़र्क़ पड़ता है कि उसके अबू उसकी अम्मी की इज़्ज़त नहीं करते, उसके मामू को उसकी बहन (मुराद की माँ) की तकलीफ जायज़ नहीं लगती, कि उसका दोस्त मोईन, धारावी के अनाथ बच्चों से गैरकानूनी काम करा रहा है, कि उसका मालिक अपनी बेटी को मुराद का उदहारण देता है कि अगर उसने स्नातक से आगे पढाई नहीं की तो उसमें और एक ड्राइवर की हैसियत में कोई अन्तर नहीं होगा, कि रैप के नाम पर जो गाड़ी, दारू और दिखावे का भौंडापन हो रहा है|बस उसे इतना भी फ़र्क़ नहीं पड़ता कि वह आगे बढ़कर इनको रोक सके, अपनी स्तिथि बदल सके| यही फ़र्क़ पड़ने की और उसे बदलने की हिम्मत रखने का सफर ही गली बॉय की कहानी है |

मुराद, बेमुराद ही जी रहा होता है,धारावी की छोटी सी खोली में, घर में 3 और सदस्यों और उसकी नयी अम्मी के साथ| धारावी के रहने वाले ड्राइवर के बेटे मुराद पर भी बाप के पैसों से पढ़कर, नौकरी करके फिर वापस लौटाने का वही दबाव है जो कमल मेहरा के बेटे कबीर मेहरा पे खानदानी व्यवसाय आगे बढ़ाने का था|माँ के एक फ़ोन कॉल पे हाज़िर हो जाने वाला, मैदान में कसरत करने वाला मुराद, अबू के सामने कंधे, सर,नज़रें झुका कर मिलता है|ऊंची आवाज़ में दब जाना और अपने अंदर के लावा को दबा देना ही उसका हल है |
वो मस्जिद में अपने पिता के पीछे चलता है, रात को भटकते हुए अपने दोस्त मोईन और दिन में अपने गुरु एम. सी. शेर के पीछे चलता है और अपनी प्रेमिका सफीना के भी पीछे ही रहता है|अबू की दूसरी शादी की शहनाइयों से खुद को काटने के लिए, ईयरफ़ोन में रैप गीत लगाकर खुदको बचाता है और अबू की नयी दुल्हन के लिए दावत कर रही माँ को आँखों से ही सांत्वना देता है | वो खुल के हस्ता भी कम ही है मगर कार में पीछे की सीट पे बैठी मैडम के आंसू न पोछ पाने की कसक उसकी ख़ूबसूरती है | गली बॉय कहानी है हमें अपने आस पास के मुरादों से मिलवाने की| शायद कोई मुराद हमारे भी आंसू पोंछने को बेताब है, हमने ही बीच में दीवार खड़ी कर दी है |
हिंदी सिनेमा में ‘हीरो का दोस्त‘

ज़ोया अख्तर और रीमा कागती की विशेष्ता है, उन्हें पता है की एक हीरो के बनने के पीछे, किसी इन्किलाब के आने के पीछे बहुत सी कहानियां और होती हैं | गली बॉय लम्बे समय तक अपने चरित्रांकन के लिए जानी जायेगी| अभिनेता, मानव कौल ने पिछले वर्ष एक इंटरव्यू में कहा था कि उन्हें सबसे ज्यादा निराशा तब होती है जब कोई निर्माता/निर्देशक उनके पास ‘हीरो के दोस्त’ का रोल लेकर आते हैं | वो उनसे पूछते हैं कि ये ‘हीरो का दोस्त’ क्या होता है? उसका कोई नाम होगा, कोई पहचान होगी, कोई मक़सद होगा| हिंदी लोकप्रिय सिनेमा में हीरो के दोस्त का मक़सद अक्सर हीरो को उसके गोल या प्रेमिका तक पहुँचाना होता है| ज़ोया और रीमा की कहानियों में हर दोस्त अपने आप में हीरो है|उनकी पहली फिल्म ‘लक बाय चांस’ में सोना (कोंकणा सेन) शूट में अपने करैक्टर का नाम पूछते हुए, खीज कर कहती है,” डेड सिस्टर की सहेली का कोई नाम नहीं है क्या? तो अलका बोलो ना |”
गली बॉय में मुराद की कहानी ऐसी ही अकीर्तित नायकों की कहानी से मिलकर बनी है |मुराद ऐसा नायक है जिसका अकेले अस्तित्व भी मुमकिन नहीं है |

एक मोईन है जिसकी तकलीफें मुराद की तकलीफों से भी बड़ी है, मुराद की पारिवारिक मुसीबतें है, मोईन का परिवार ही नहीं है| मोईन दरअसल सलीम-जावेद का लिखा हुआ एंटी-हीरो है | अपनी परिस्तिथियों से ऊपर उठने की चाह में उसने हर ग़लत मौका भी कस के पकड़ा है,चोरी से लेकर ड्रग पड्लिंग तक और उसके कोई उसूल-आदर्श नहीं है| उसे मुराद की कामयाबी से कोई दिक्कत नहीं है मगर उसकी कामयाबी में उसके साथ न रखने से कहीं उसके अहम् को चोट पहुँचती है | हर बार शिखर की और थोड़ा बढ़ता हुआ मुराद एक बार धरातल पे फिर से मोईन का सहारा लेने आता है | इसलिए मोईन को मुराद के नैतिकता के उलहाने बेईमानी लगते हैं | जब मुराद और सफीना के रिश्ते में दरार आती है तब मोईन ही मुराद को उसकी सच्चाई दिखाने की हैसियत रखता है| बड़े भाई की तरफ हमेशा आगे चलता हुआ, मोईन, मुसीबत सहने के वक़्त भी मुराद के आगे आ जाता है | मुराद की आँखों में कृतग्यता है, ग्लानि है, मोईन उसकी मदद करते हुए , जेल के अंदर है, लेकिन मोईन की आँखों में कोई एहसान नहीं है बस मुराद को बढ़ावा देने का सम्बल है और अपने बच्चों के लिए फ़िक्र | मोईन के बिना मुराद भी मोईन की तरह जेल के उस तरफ हो सकता था |

एक है ऍम. सी. शेर, मुराद का गुरु, पथप्रदर्शक | बड़े दिलवाला, आत्मसंतुष्ट,असुरक्षा से कोसो दूर | माँ की बिना जीते हुए और बाप के तानो के बीच रहते हुए, शेर ने दुनिया की बेकार बातों से खुद को बेफिक्र कर लिया है | शेर असली मर्द है, उसमें कुछ भी नक़ली नहीं है| दूसरों के नकलीपन को प्यार से धरातल पे लाना उसे आता है | अपनी ‘बैंड’ की महिला कलाकार के अपमान पर शेर, लड़कों पे अपनी ताक़त नहीं आज़माता, अपने गीत से फेमिनिज्म के नारे बुलंद करता है | मुराद के अंदर की आग का ईंधन, शेर, मुराद का जंगल में बाहें खोल के स्वागत ही नहीं करता, बल्कि उसे जंगल के नियम भी समझाता है| शेर से मुराद को एक और बड़ी देन मिली है, अपनी जड़ो को स्वीकारना | शेर को अपने परिवार/अपने काम को लेकर कोई शर्मिंदगी नहीं है,वो अपने सच को हथियार की तरह इस्तेमाल कर दूसरों के सच पे प्रहार करता है| शेर के बिना मुराद अपनी जड़ को स्वीकारा नहीं सकता, न ही उसपे फक्र महसूस कर सकता है | शेर मुराद की कहानी को आवाज़ देने से मना करता है और उसे उसकी कहानी खुद सुनाने के लिए जंगल में फेक देता है, इसलिए मुराद अपनी आवाज़ ढूंढ पाता है | शेर निस्वार्थ है, शेर इस दुनिया में अभी भी थोड़ी अच्छाई बची रहने की उम्मीद है |

एक है स्काई जो मुराद और शेर के सपनों को उड़ान देने आती है, उनको नयी दुनिया में ले जाती है और दुनिया को उनके पास तक लाती है | स्काई मुराद को एहसास कराती है कि मुराद की कला ,स्काई को उसके करीब लाने के लिए काफी है | नीचे नगर से आया मुराद स्काई की सोच से, उसकी विचारधारा से आकर्षित है, स्काई की नयी, खुली हुई दुनिया में घुटन भरी गलियों से आये मुराद का भटकना लाज़मी है मगर उसके घर के बाथरूम को अपने कदमो से नापते मुराद को अपनी हकीकत से दूर रखना मुमकिन नहीं है | स्काई मुराद और सफीना के रसायन में कैटेलिस्ट है और उनके जीवन का ये हिस्सा उन्हें बस थोड़ा और मानवीय बनाता है |
गली बॉय की पॉलिटिक्स
गली बॉय मुराद की कहानी होने के साथ बहुत सी ज़रूरी बातें उठाती है |आभिजात्यवाद,समाजवाद, नारीवाद, पितृसत्ता यह सारे मुद्दे कहानी में अपनी मौजूदगी बिना शोर के दर्ज करते रहते हैं|

दुनिया के क्रूर सच्चाइयों से मुराद के सपने को बचाती उसकी माँ जिसका सपना है की उसका बेटा नौकर नहीं बनेगा | पति अधेड़ उम्र में जवान बीवी ले आया है, अपमान के घूट पी कर जीती रज़िया जवाब देना जानती है कि उसके पति ने कभी नहीं सीखा उसे कैसे छूना है लेकिन वो तो कभी किसी गैर मर्द को घर नहीं लायी |

अपने जवान बेटे को सपने देखने की भी इजाजत नहीं देने वाला आफताब, जो बाहरी तौर पर बेहद क्रूर दिखता है मगर वो अंदर से दुनिया के अनकहे नियम ‘नौकर का बेटा नौकर ही बन सकता है’ के आगे घुटने टेक चुका है | बेटे के संगीत के शौक के लिए उस पर हाथ उठाता आफताब शैख़ उससे ही परास्त होने के बाद उससे उसके सपनो को उसकी सच्चाई की सीमा में रखने की दरख्वास्त करता | सबसे बुरा होता है किसी को सपने देखने की इजाज़त भी न देना| आफताब को अभिजात्यवाद ने इजाज़त नहीं दी, पितृसत्ता मुराद से उसका हक़ छीन रही है |


मुराद से बेइंतेहा मोहब्बत करने वाली सफीना को झूठ बोलने से और बातें अपने हक़ में घुमाने से कोई ऐतराज़ नहीं है , ना ही वो किसी से डरती है| उसे लगता है की अगर वह डरती रही तो ज़िन्दगी के इतने सारे सपने कैसे पूरे होंगे| महत्वाकांक्षी और काबिल सफीना की ज़िन्दगी की तिलमिलाहट है उसकी अम्मी का अंकुश और सुकून है मुराद| बचपन के दोस्त रहे सफीना- मुराद का प्यार दुनियावी बनावट से परे है| जो हिंसा सफीना की अम्मी उसकी ज़िन्दगी काबू में रखने को करती है, वही झुनहलाहट सफीना, मुराद को अपने काबू में न रख पाने पे निकालती है | अपनी प्रेमी की बड़ी गलती सफीना आसानी से माफ़ कर देती है और उसके सपने को जान देते कहती है की वो सब संभाल लेगी, घरवालों को भी, उनकी ज़िन्दगी भी | सफीना अपने डॉक्टर बनने के सपने को मुराद से शादी करने के सपने से ऊपर रखती है |सफीना के प्यार और हिम्मत के आगे कभी कभी मुराद बहुत कमज़ोर नज़र आता है |
जय ओझा का छायांकन ऐसे है मानो धारावी की गलियों के हिस्से में ठीक से धूप भी नहीं है| मुराद और उसके जैसे औरों के घरों में न ही सूरज की रौशनी ठीक से आती है और न ही उनकी छतों को चांदनी नसीब है,बहुतों को शायद छत भी नसीब नहीं है| पूरी फिल्म एक रंग में है, धारावी की ज़िन्दगी तो जैसे रंगविहीन है , फिल्म में अभिजात्य वर्ग भी रंगीनी, चमक धमक से अलग है|
गली बॉय के गीत ज्वलनशील है और युवा गीतकारों की कलम बहुत गरम| फिल्म का संगीत मुक्काबाज़, गुलाल, दंगल की श्रेणी का है| एक गीत के बोल हैं –
“हाँ तुझे छेड़ने की तलब है
तु नकली वाला मरद
मर्दानगी पे कलंक
हैवानियत की शकल
जितनी तुझमे में गर्मी
उससे ज़्यादा गरम
मेरा कलम
क्यूँ इतना बेशरम”
यह शब्द युवा रैप कलाकारों की विचारधारा से आती है, हिन्दुतान का असली हिप-हॉप |
ज़ोया अख्तर मुराद की कहानी कहते हुए बहुत सी बातें छूती हैं | लेकिन आखिर में गली बॉय अच्छे लोगों की कहानी है | बड़े दिलवालों की,अच्छाई की ,आशा की, सपने देखने के साहस की और सपनों पे यकीन करने की| कहानी है सपनों के सफर और उस सफर में बहुत से साथियों की |
क्यूंकि इतने दुःख और संघर्षों के बाद भी मुराद में कोई कड़वाहट नहीं है | उसे किसी से बदला नहीं लेना है ना पिता से, ना माँ की उपेक्षा करती दादी से, ना मामू से | मुराद लेकर लौटने वालों में से है | जब उसे बहुत बड़ा मौका मिलता है तो वो उसे शेर के साथ बांटता है, कामयाब होने के बाद मोईन को आज़ाद कराता है और दादी को पैसे देना नहीं भूलता | गली बॉय बेशक एक फील गुड फिल्म है | मगर ऐसे सुखद, सकारात्मक अंत से कोई शिकायत नहीं होनी चाहिए |





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