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हर फिल्म उस दौर के दर्शकों के सोच की , जीवनशैली की परछाई होती है, मौजूदा दौर के लोगों की आवाज़| “पिंक” ऐसे ही फिल्म है , इस दौर की आवाज़ भी और इस दौर की नयी परिभाषा गढ़ती हुई| फेमिनिज्म की परिभाषा को नए आयाम देने की और इसे बड़े तौर पर लोगों तक पहुँचाने की कोशिश 2012 के वीभत्स “निर्भया” केस के बाद हुई थी जब सड़क पे उतर के लोगों ने देश की सारी माओं/ परिवारों से कहा था कि अपनी बेटियों को घर से निकलने से मना करने के बजाय अपने बेटों को उनकी इज़्ज़त करना सिखाएं| उस वक़्त नेताओं और स्वयंघोषित महापुरुषों के भी बेहद हास्यप्रद बयां आये थे जैसे जीन्स पहनने से ,मोबाइल फ़ोन का इस्तेमाल करने से और चाउमिन खाने से लड़कियां बलात्कार का शिकार होती है| अर्थात यह टिपिकल पुरुषसत्ता के सिस्टम से निकले चलन थे जिसमें औरतों को ही उनके प्रति होने वाले अपराधों का ज़िम्मेदार ठहराया जाता था| “पिंक” इसी पुरुषसत्ता को जड़ से उखाड़ने का प्रयास करती है| “पिंक” में कोई नयी बात भले ही ना उठायी गयी हो, मगर वह ज़रूरी बातें हैं जिसे लोगों के दिमाग में दर्ज करना ज़रूरी था कि जब कोई महिला अपने साथ हुए किसी भी बर्ताव के लिए ना कहती है , तो उसका अर्थ ना ही होता है और यह दो सिलेबस का शब्द “ना” अपने आप में एक पूरा वाक्य है , अस्वीकृति का , रोक का|

मीनल( तापसी पन्नू), फलक (कीर्ति कुल्हारी) और एंड्रिया (एंड्रिया तारियांग) दिल्ली में एक घर में साथ रहती है| तीनो कामकाजी हैं, आर्थिक तौर पर स्वतंत्र, जो अपने परिवार से अलग अपनी ज़िन्दगी अपने तरीकों से जीती हैं,रात घर देर से लौटती हैं, अकेले सफर करती हैं और रोज़ आते जाते न जाने कितने बार सबकी नज़रों में खुद को तौलते हुए देखती हैं|

एक रात म्यूजिक कॉन्सर्ट के बाद तीनों अपने कुछ पुरुष मित्रों के साथ डिनर पर जाती हैं | राजवीर सिंह (अंगद बेदी )और उसके दोस्त राजनैतिक और प्रभावशाली परिवारों से हैं| किन्ही परिस्तिथियों में राजवीर पर मीनल वार करती है , यह कहानी की शुरुआत में नहीं पता चलता, लेखक और निर्देशक हमारी सारी पूर्वधारणाओं, हमरे अनुमान से खेलते हैं और फिल्म के अंतिम क्रेडिट रोल्स में वास्तविक घटना का विवरण होता है| दीपक सहगल (अमिताभ बच्चन) इन तीनो लड़कियों के पड़ोसी हैं और हमेशा इनपर नज़र रखे हुए होते हैं, अवसादग्रस्त होने कि वजह से अब वकालत से रिटायर्ड हैं , मीनल का केस समझने के बाद वो उनकी तरफ से लड़ने को तैयार हो जाते हैं|

परत दर परत कहानी जब खुलती है , हमारी सारी अवधारणाएं धराशायी होती जाती है, मीनल , फलक और एंड्रिया का खौफ परदे से बाहर रिस कर हमारे अंदर रेंगता है |तीनो लड़कियां साधारण , कामकाजी, हमारे आस पास के पात्रों जैसी , पुलिस स्टेशन में FIR दर्ज करते वक़्त पुलिस की उपेक्षा, उनके घर में लड़कों के आने जाने को लेकर पड़ोसियों का चरित्र आकलन , अदालत में उनकी वर्जीनिटी का मुद्दा उठने पर उनपर संदिग्ध चरित्र का टैग, हमें जैसे किसी अपराधबोध यात्रा पर ले जाता है , जब जितनी बार हमने किसी वजह से लड़कियों को स्टीरियोटाइप किया था|

राजवीर का मानना है क्योंकि मीनल उसके साथ शराब पीने को तैयार हो जाती हैं, उनसे हंस हंस के बात करती है, उन्हें बातों के दौरान कभी छू लेती हैं और एक बार कहने पर आसानी से उनके साथ रिसोर्ट  में आ जाती है तो ऐसी लड़की के साथ ऐसा ही होना चाहिए| पिंक हर स्टीरियोटाइप टाइप पे सवाल उठाती है। कोर्ट केस के दौरान दीपक सहगल इन्हीं स्टीरियोटाइप से इन लड़कियों पर होती छींटाकशी के आधार पर एक रूल बुक तैयार करते हैं मसलन लड़कियों को किसी भी लड़के के साथ कभी भी अकेले नहीं मिलना चाहिए, किसी लड़के से हंस के बात नहीं करनी चाहिए, कभी शराब नहीं पीनी चाहिए , लड़के बेशक पी सकते हैं |ये बातें गुदगुदाती भी हैं, मगर बेहद गंभीर हैं , यही हुआ है अब तक , पुरुषों कि पशुता को ऐसे ही ढका जाता रहा है| हमारे समाज के आंटी अंकल्स अकसर यही रोना रोते हैं, जब किसी लड़की के साथ यह पशुता हो जाती है| “पिंक” एक उम्मीद है, अगर आज का समाज इससे नहीं सीख सकता , तो आगे आने वाली तमाम पीढ़ियों के लिए फिर नाउम्मीदि ही दिखाई पड़ती है|

पिंक एक बहुत अच्छी मोरल स्टोरी हो सकती थी, मगर पटकथा के तौर पर फिल्म में काफी कमियाँ है, निसंदेह अच्छे मक़सद कि वजह इन्हें नज़रअंदाज़ किया सकता है| कोर्ट केस की सारी कारवाही को बहुत सुविधाजनक रुख दिया गया है , हालांकि पिछले साल ही हम बेहतरीन फिल्म “कोर्ट” देख चुके हैं , इसके बावजूद नियमित कोर्ट रूम ड्रामा शैली से अलग कुछ प्रयास नहीं किया गया| फिल्मकार आज भी अच्छी कहानी को परंपरागत रवैय्ये से परोस रहे हैं और ये रवैय्या “पिंक” जैसी फिल्म को महान बनने से १-२ कदम पीछे छोड़ देता है|

तीनो अभिनेत्रियों का काम सीनियर एक्टर्स ( अमिताभ बच्चन, पियूष मिश्र, धृतिमन चटर्जी) पर भारी पड़ता है| यह फिल्म , तीन पुरुषों के सोच कि उपज है , रितेश शाह (लेखक), अनिरुद्ध रॉय चौधरी (निर्देशक) और शूजित सरकार (प्रोड्यूसर) , और इस फिल्म से उन्हें हमेशा याद रखा जायेगा|

एक महत्वपूर्ण दृश्य में दीपक सहगल , राजवीर कहते हैं कि जब मीनल मुझे एक एडल्ट जोक सुना सकती है तो ऐसी लडकियां हम लड़कों को खुद आमंत्रित करती हैं, दीपक सहगल मीनल से जोक सुनाने कहते हैं, शर्म और ग्लानि से भरे मीनल के पिता , अदालत से उठ के चले जाते हैं| वह सारे काम जो मर्द अपने दोस्तों के बीच शान से करते हैं, अगर कोई महिला कर ले तो उसे हल्का मान जाता है, कभी कभी प्रोस्टिट्यूट भी| गौर किया जाए तो पुरुषों की नैतिकता और प्रॉस्टिट्यूट्स की नैतिकता में कोई फ़र्क़ नहीं है| दुसरे दृश्य में एंड्रिया कहती है कि नार्थ-ईस्ट से होने के कारण उन्हें महसूस हुआ है कि औसतन भारतीय महिलाओ के अपेक्षा वह ज्यादा मोलेस्टेशन कि शिकार हुई है|

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“पिंक” इसलिए महत्वपूर्ण फिल्म है, यह बातें जब प्रभावशाली अमिताभ बच्चन बोलते हैं तो शायद दर्शकों के पल्ले अच्छे से पड़ेगी|

“पिंक” परिवार के साथ देखी जानी चाहिए और परिवार को , पड़ोस के आंटी अंकल्स को, प्रोफेस्सोर्स-टीचर्स को दिखाई जानी चाहिए| मौलवी- बाबाओं और नेताओं पे यह असर कभी नहीं होगा |

2 responses to ““पिंक”-कहानी जो देर से आई, मगर वक़्त पे आई!!!”

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