बहरहाल टायलेट 100 करोड़ कमा कर सफल हो गयी है। “पॉपुलैरिसम” और “100 करोड़ क्लब” के मौजूदा पैमाने में फ़िल्म की गुणवत्ता और तकनीकि पक्ष के बारे में बात करना बेमानी हो गया है।  टॉयलेट की शुरुआत में जया(भूमी)के काका और पिताजी साथ में टीवी पर तेज़ आवाज़ में सनी लियोनी के विडियो को मज़े से देख रहे होतें हैं। ग़ौर करने की बात है कि ये परिवार भी गाँव में रहता है। मगर सिनेमा के गाँव की अपनी यात्रा उसे बहुत दूर ले आयी है। इसलिए गाँव का लड़का ,केशव (अक्षय) जया से प्रेम होने से पहले भी प्रेम कर चुका हैं और अपनी प्रेमिका के शादी के दिन भी उस्से मिलता हैं, उस्से अपने पुराने दिनों को याद करके बड़े हल्के तौर पर मजा़क भी करता और उसकी प्रेमिका में भी वियोग के कोई दुखी लक्षण दिखाई नहीं देते। वहीं जया जो कि पढ़ाई में अव्वल है , सायकल में घूमती है , तेज़ इतनी कि बद्तमीज़ लड़कों की अक़्ल ठिकाने लगा दे और प्रेम में पड़ने पर उसी लड़के का पीछा कर उसके सामने शादी का प्रस्ताव भी रख सके। हमारे गाँव-शहर भी हमारी तरह आधुनिकता और रूढ़िवादिता के बीच एक जर्जर पुल से लटक रहे हैं। इसलिए आसपास होते हुए भी जया और केशव के गाँव सिद्धांतों में एक दूसरे से सदियों दूर हैं। बिना टॉयलेट का घर जया की कल्पना से परे है इसलिए वो केशव से विवाह के पूर्व ये पूछती भी नहीं और केशव के लिए टॉयलेट का ना होना कोई बड़ी समस्या नहीं इसलिए वो ये बात बताता भी नहीं।

टॉयलेट एक महत्वपूर्ण फ़िल्म होते हुए भी परिपूर्ण और इमानदार प्रयास नहीं लगती। ये होता है जब फ़िल्मकार चुनातीपूर्ण विषय के साथ न्याय नहीं कर पाते। मनोरंजक रूप देने के चक्कर में हम कहानी का छीछालेदर तो करते हीं हैं ।अच्छे रिसर्च को अच्छी पटकथा में बदलने के पीछे लेखक और निर्देशक की कल्पना और दृष्टि होती है। भारतीय गाँवों में आज भी खेतों में शौच जाने की परंपरा है और महिलाओं के लिए स्तिथी और बद्तर है। ये कथा जो एक सशक्त सामाजिक क्रांति का परिवहन बन सकती थी , स्वयं का कैरिकेचर बन के रह जाती है। गरिमा और सिद्धार्थ के लिखे पात्र ढुलमुल तो हैं ही , दर्शकों में कोई उन्माद भी नहीं जगाते। खुले में शौच की गंभीर समस्या के बावजूद हमें पात्रों की मुश्किल से दर्शकों को कोई तकलीफ़ नहीं होती। जैसे आसानी से वो मिल जाते हैं , उतनी ही आसानी से अलग हो जाते हैं , सब कुछ सतही स्तर पर है। इसलिए जया , परीक्षा में अव्वल आने के बाद, केशव को खरी थोड़ी सुनाने बाद भी , उसी तर्ज़ पर केशव का पीछा कर , अपने से 12-15 वर्ष बड़े आदमी से ख़ुशी ख़ुशी शादी को तैयार हो जाती है। केशव जो कि 36 वर्षीय आदमी है, छिछोरों की तरह , छोटी लड़की का पीछा करता है, उसकी विडियो बनाता है और जया के सामना करने पर उसका तर्क होता है कि वो कपड़े नक़ली ब्रांड्स पहनता है मगर दिल से देसी है, पढ़ाई पूरी नहीं करने के बावजूद जी .के. में सबसे तेज़ है और अगर जया को ज़िंदगी में रोमांस चाहिए तो डॉक्टर इंजीनियर को छोड़ कर उस्से शादी कर ले। सच पूछो तो पहली नज़र में इनके प्रेम में क्रांती लाने की तीव्रता दिखती नहीं।

टॉयलेट केशव के व्यक्तिगत विकास की भी कहानी है। जुगाड़ू , खिलंदड़, छिछोरेपन से एक संवेदनशील पति बनने तक ओर स्वार्थ से उठकर समाज में बदलाव लाने की यात्रा तक।


कमज़ोरी: फ़िल्म की पटकथा, संवाद और निर्देशन ही इसकी सबसे बड़ी कमजो़री हैं। एक वक़्त के बाद संडास जैसे “टॉयलेट ह्यूमर” खीज पैदा करते हैं और बची खुची निष्ठा को और हल्का करते हैं। गानों का भी कोई खा़स मक़सद दिखाई नहीं पड़ता। लट्ठमार होली के दृश्य केवल थोड़ी आंचलिकता दर्शाने के लिए हैं। द्वियवेंदु शर्मा के किरदार में कोई ग्राफ़ नहीं हैं। पूरे वक़्त ऐसे चुटीले, बेपरवाह अंदाज़ में कौन बात करता है। अनुपम खेर, सचिन खेड़ेकर के पात्र अनावश्यक हैं। ख़ूबियाँ: फ़िल्म के विषय के बाद , अक्षय कुमार का अभिनय और मौजूदगी ही फ़िल्म की ताक़त है। अक्षय कुमार अच्छे ही अभिनेता हैं मगर उनके पात्रों की विविधता की झलक उनके अभिनय में नहीं दिखती। उनके ह्यूमर का भी अपना एक ब्रांड है जो एक ही ग्राफ़ में चल रहा। “जानेमन” और “पटियाला हाउस” वाली विविधता की ज़रूरत है। भूमी पेडनेकर अपने किरदार को बहुत सहजता से निभाती हैं मगर कमज़ोर किरदार की वज़ह से स्थिरता नहीं है । तमतमायी हुई जया का क्रोध में अपने ससुर को खरी खरी सुनाना, फ़िल्म के सबसे सशक्त दृश्यों में से है। सबसे कमाल फ़िल्म के लोकेशंस , कॉस्ट्यूम्स और आर्ट डिज़ाइन हैं। तीनों मिलकर ग्रामीण पृष्ठभूमि की विश्विसनियता पैदा करते हैं। शादी के बाद टॉयलेट की जद्दोजहद की बीच केशव की अपनी पत्नी के प्रति निष्ठा और उनका रोमांस गुदगुदाता है। श्याम बेनेगल ने अपने करियर में सामाजिक महत्व की ही फ़िल्में बनाई हैं। श्वेत क्रांती पे बनी “मंथन” और महिलाओं के प्रजनन अधिकारों पे बनी “हरी भरी” यथार्थवादी होने के साथ प्रभावशाली फ़िल्में भी हैं। टॉयलेट, प्रधानमंत्री ,श्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छता अभियान पर बनी है। 

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