
अपनी बढ़ती उम्र में मैंने बहुत बार अपने माँ-पिता से ‘दीवार’ और ‘त्रिशूल’ का ज़िक्र सुना था, ये हमारी पारिवारिक सबसे पसंदीदा फिल्में थी | जब भी ये दो फिल्में आती , पूरे परिवार के साथ देखी जाती और उनके संवाद दोहराये जाते|”दीवार” और “त्रिशूल” , सलीम-जावेद और “एंग्री यंग मैन” ,अमिताभ के सर्वश्रेष्ठ कृति की गवाही थे| और तब बच्चन की तारीफों के कोलाहल के बीच, शशि कपूर का एक ही संवाद गूंजता था , “मेरे पास माँ है” | इसी संवाद के बाद भींची हुई सांस छोड़ी जाती थी, तालियां बजनी शुरू होती थी, और आपसी संवाद शुरू होते| शशि कपूर को तब मैं शायद बस “सेकेंडरी करैक्टर” के तौर पे जानती थी | कुछ सालों बाद सैफ अली खान की “दिल चाहता है” और अरशद वारसी की “सर्किट” से दूसरी पारी शुरू होने के बाद मैंने घर में ही सुना था कि वो भी अब शशि कपूर की तरह “सेकंड लीड” के तौर पे चल निकलेंगे|
फिर किसी रोज़ माँ के साथ बैठ कर उनकी पसंदीदा पुरानी फिल्में देखने के रूटीन तहत , मैंने शशि कपूर और हेमा मालिनी अभिनीत “अभिनेत्री” देखी| यूँ कहना चाहिए की अपने 20’s में मैंने 1960’s के चार्मिंग, खूबसूरत हीरो शशि कपूर को “डिस्कवर” किया| और उनसे एक पल भी मेरी नज़र हटने को मानो तैयार ही नहीं थी उनका सौम्य, शर्मीला रोमांस का अंदाज़ , चमकती आँखें और परत दर परत , धीमें धीमें फैलती मुस्कान बेहद दिलकश और सबसे जुदा थी| पिछले हफ्ते उनके देहांत की खबर सुनते ही मुझे सबसे पहले,कश्मीर में हेमा मालिनी के साथ ” सा रे गा मा पा” गाते हुए बेहद खूबसूरत शशि कपूर की याद आयी जिन पर मैं कुछ 24-25 की उम्र में मुद्घ हो गई थी| मौजूदा पीढ़ी उनके चार्म, उनके जादू से बिलकुल अनजान रही है क्यूंकि कुछ हरफनमौला कलाकार ,”महानायकों” की चमक में कहीं छुप जाते है|
वैसे भी,शशि कपूर रजत पट पर कोई सितारा बन चमकने आये थे, अपितु उन्होंने हमेशा अपने स्टारडम को बहुत हल्के में लिया और शायद इसी से उनमें “आइवरी-मर्चेंट” के साथ काम करने की समझ और “जूनून”,”कलयुग”,”विजेता” बनाने का साहस आता था|

उनके बारे में पढ़ते हुए, उनकी कुछ देखने को बाकी रह गयी फिल्में देखते हुए समझ आया कि हिंदी सिनेमा में उनका योगदान बहुत अप्रत्यक्ष रहा है | शशि साहब लगभग वह पहले अभिनेता थे जो व्यावसायिक और कला फिल्मों के बीच सेतु बने और साथ ही हिंदी और अंतर्राष्ट्रीय सिनेमा के भी|
गौरतलब है की जिस तरह दीवार के विजय वर्मा (अमिताभ बच्चन) के पूरक रवि वर्मा थे, शशि कपूर अपने समकालीन अभिनेताओं में सबके ही पूरक रहे| हिंदी सिनेमा में जब हमारे अभिनेता बाकायदा स्क्रीन पे सितारा या हीरो बनना चाहते थे, 20 बरस में विवाह होने के बाद शशि कपूर बस अपने पत्नी बच्चों को अच्छी ज़िन्दगी देने के लिए सिनेमा में अभिनय करने, अपनी जीविका अर्जित करने आये थे| थिएटर को अपना पहला प्रेम समझने वाले शशि कपूर को पेड़ो के इर्द गिर्द नाचना गाना बहुत असहज लगता था किन्तु पेड़ के इर्द गिर्द सबसे यादगार गीत पर सबसे लुभावना नृत्य, हिंदी सिनेमा में शशि जी का “निसुल्ताना रे” और “ओ मेरी शर्मीली” ही रहा है|
शशि कपूर के बाद,हर दौर के अभिनेता के प्यार करने के अंदाज़ में उनकीं ही झलक दिखती है, जैसे किसी के पास कुछ और करने को बचा ही नहीं | शाहरुख़ खान से बहुत सालों पहले शशि कपूर अपनी बाहें खोल कर, घूम कर भारतीय दर्शकों को मन मोह चुके थे|अपने बड़े भाईयों जैसे “लार्जर देन लाइफ” और रंगमिजाज़ छवि वाले सितारों के बीच शशि कपूर चमक धमक से परे बिलकुल परिवारिक व्यक्ति थे| और बलशाली, एक्शन हीरो, एंग्री यंग मैन के दौर में अत्यंत सहज, स्वाभाविक अभिनेता थे जिन्होंने हिंदी सिनेमा के हीरो की मासूमियत और शराफत सहेज कर रखी थी|

हालाँकि शशि कपूर ने अपने करियर के शुरूआती दिनों में ही आइवरी-मर्चेंट के साथ “द हाउसहोल्डर” करने की समझ और साहस दिखाया था किन्तु मुख्यतः 60 के दशक में प्रेमी की ही भूमिका निभाई थी| और लगभग हर फिल्म में अच्छे ही लगे, बेहद साधारण फिल्मो में भी अपने अंदाज़ और स्वाभाविक अभिनय से उन्हें ख़ास बना दिया|यह हम भारतीय दर्शकों का दुर्भाग्य ही है की हमने अक्सर सहज ,स्वाभाविक अभिनेताओं को हमेशा से नज़रअंदाज़ कर, मैलोड्रामैटिक एक्टर्स को ही पहले पायदान में रखा है|
अपने परिवार को अच्छी ज़िन्दगी देने के मक़सद से , फिल्मों को अपना व्यव्यसाय बनाने आये शशि कपूर घोर व्यावसायिक फिल्में करने के साथ साथ ,अपने अभिनय कला के प्रेम के लिए साथ-साथ गैर व्यावसायिक, कला सिनेमा भी करते रहे | 1962 में उनकी बिमल रॉय द्वारा निर्देशित “प्रेमपत्र” और आइवरी-मर्चेंट की “द हाउसहोल्डर”, दो बिल्किल भिन्न फिल्में साथ आयी | 1964 में “जब जब फूल खिले” से एकल हीरो की कामयाबी का स्वाद चखने के बाद उसी साल उन्होंने जेम्स आइवरी के साथ दूसरी फिल्म “शेक्सपियरवाला” भी की|1970 में जब वो “माय लव” और “सुहाना सफर” जैसी फिल्में कर रहे थे , जो सारी एक सी फार्मूला फिल्में लगती थी , उसी साल उन्होंने मर्चेंट आइवरी की ” बॉम्बे टॉकी” में नकरातमक भूमिका निभाई थी | इस फिल्म में उन्होंने हिंदी सिनेमा के अभिनेता का पात्र निभाया था| एक अभिनेता के जीवन के भ्रम ,असंतुष्टि, असुरक्षा, लालच, वासना ,अहं जैसे सारे रंग दिखाए थे और यह नकारात्मक भूमिका उन्होंने इतने सहजता से निभाई थी की दर्शकों को उनसे नफरत भी हो किन्तु ना कर पाने की बेबसी भी|यह ऐसा ग्रे शेड किरदार था जो मुख्यधारा सिनेमा का कोई अभिनेता करने से पहले बहुत सोचता या शायद न ही करता|


70 के दशक में सलीम-जावेद की दीवार (1974), अमिताभ बच्चन के साथ-साथ , शशि कपूर के लिए भी निर्याणक मोड़ साबित हुई| “दीवार”, ‘त्रिशूल”, “कभी कभी” से वह एक मासूम, शोख, जवान प्रेमी से शरीफ,यथार्थवादी, परिपक्व किरदारों में आ गए | मगर उनके हर किरदारों में वही खिलंदड़पन, वही शरारत और आशावाद बना रहा|
80 के बाद की पीढ़ी शायद शशि कपूर को अमिताभ-शशि की इन्ही फिल्मों से जानते हैं| उस वक़्त शशि-अमिताभ की जोड़ी वाली हर फिल्मों में शशि कपूर,अमिताभ के आग में बर्फ का किरदार निभाते रहे|”कभी-कभी” के विजय खन्ना, अपनी पत्नी पूजा (राखी) के असफल प्रेम को अपने यथार्त और साथ से पूरा करते हैं| अपनी पत्नी और उनके पूर्व प्रेमी(amitabh) के एक कमज़ोर क्षण में पुरानी बातें याद करते हुए शशि कपूर को सच्चाई पता चलती है, तो वो बड़प्पन से कहते हैं कि उन्हें तो खुश होना चाहिए, फक्र होना चाहिए | उनकी बीवी है ही इतनी हसीन की किसी का भी जान देना का मन करता है| “दीवार” में रवि और विजय वर्मा एक ही परिस्तिथि में बढ़े हैं मगर दुनिया की कठोरता ने रवि के उसूल मज़बूत किये , उसका दिल नहीं| नौकरी न मिलने के बावजूद वे माँ का दिल रखने के लिए मंदिर जाते हैं और नौकरी मिलने पर आसानी से खुद से ज्यादा ज़रूरतमंद के लिए ठुकरा देते हैं| त्रिशूल में यह जानते हुए की अमिताभ ,उनके और हेमा मालिनी के रिश्ते में जानकर खलल दाल रहे हैं , बड़ी शराफत से उनकी गलती छुपा कर ,बात टाल देते हैं| यह महज़ कोई इत्तेफ़ाक़ नहीं हो कि ऐसे किरदार शशि कपूर पर ही लिखे गए , इन सब किरदारों में उनके सौम्य स्वभाव, “परफेक्ट जेंटलमैन” की ही छवि थी|
शशि कपूर को करीब से समझने के लिए आप उनका कोई भी इंटरव्यू देख सकते हैं |मौजूदा सितारों के लिए शशि कपूर के सारे सक्षात्कार किसी ऑनलाइन ट्यूशन की तरह हो सकते हैं| टेढ़े से टेढ़े और बेहद निजी सवालों के जवाब जिस सज्जनता और मोहक अंदाज़ से वह देते थे , उससे समझ आ जाता है की निजी ज़िन्दगी भी उन्होंने उसी सहजता, बिना किसी राजनीती के बिता दी होगी| 46 की फिल्म में खुद को मजाकिया लहज़े में बेहद बुजुर्ग मानने वाले शशि कपूर ने अपनी निर्मित फिल्म “विजेता” में खुद को करैक्टर रोल दिया था क्यूंकि उस उम्र में उन्हें उनके बेटियों की उम्र की हेरोइन के इर्द गिर्द गाने में बहुत अटपटा लगता था| साक्षात्कर्ता के एक सवाल पर की उन्होंने कभी अपने बच्चों को सिनेमा में ज्यादा बढ़ावा क्यों नहीं दिया ,उनका जवाब था की क्यूंकि उनके पिताजी ने कभी उनपर कभी कोई दबाव नहीं दिया था , शशि कपूर भी चाहते थे उनके बच्चे बिना उनके सहारे के खुद गिरे, खुद उठे और खुद की समझ से अपने जीवन निर्णय ले| यह वर्तमान पीढ़ी और मीडिया को उनका “नेपोटिस्म” और “एज गैप” पर उनका जवाब है|
https://www.youtube.com/watch?v=cw8RBx8uerY https://www.youtube.com/watch?v=KqkPlXIKF8I15-17
सालों तक काम करने के बाद उनमें एक कसक थी कि इतने साल काम करने के बावजूद उन्होंने अभी तक कोई ऐसे फिल्म नहीं की जिसपर उन्हें आत्मसंतुष्टि हो और साथ ही जागा उनके पहले प्रेम थिएटर का आकर्षण इसलिए 1977 से उन्होंने पृथ्वी थिएटर्स की दूसरी पारी शुरू की और 1978 में उनकी पहली फिल्म निर्माता के तौर पर “जूनून” आयी| उसके बाद उन्होंने “कलयुग”, “विजेता”, “३६ चौरंगी लेन” और “उत्सव” बनायीं जिन्होंने नेशनल अवार्ड्स और अन्य अवार्ड्स जीते किन्तु उनकी फिल्मो के बॉक्स ऑफिस पर कामयाबी न मिलने पर ,वो अपनी उसी आशावादी हँसी के साथ के कहते थे , “पृथ्वी” की वजह से वह आज भी हस्ते मुस्कुराते रहते हैं | शशि कपूर जैसे “परफेक्ट जेंटलमैन” अब नहीं बनते, बन ही नहीं सकते|मेरे लिए वो हमेशा युवावस्था की देहलीज़ पे कदम रखते ही अपने से किसी बहुत बड़े से हो जाने वाली मोहब्बत की तरह रहेंगे |





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